मैंग्रोव वनों का विनाश: कार्बन उत्सर्जन में संभावित 50,000% वृद्धि

saurabh pandey
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एक नए अध्ययन में पाया गया है कि यदि मैंग्रोव के जंगलों का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो सदी के अंत तक कार्बन उत्सर्जन की वार्षिक दर में 50,000% तक की वृद्धि हो सकती है।”

मैंग्रोव वन: कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण भूमिका

मैंग्रोव के जंगल प्राकृतिक रूप से कार्बन को संग्रहित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ये विशेष रूप से अपनी मिट्टी में बड़े पैमाने पर कार्बन जमा करते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है। हालांकि, पिछले 20 वर्षों में शहरीकरण, कृषि और जलीय कृषि के विस्तार के कारण मैंग्रोव वनों में भारी गिरावट आई है। इसका सीधा प्रभाव वैश्विक कार्बन बजट पर पड़ा है।

कार्बन भंडार में भारी गिरावट

शोधकर्ताओं के अनुसार, मैंग्रोव वनों के विनाश से अब तक 15.84 करोड़ टन कार्बन का नुकसान हो चुका है। इसके चलते बड़ी मात्रा में कार्बन वायुमंडल में प्रवेश कर रहा है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। अध्ययन के अनुसार, विशेष रूप से दक्षिण भारत, दक्षिण-पूर्वी चीन, सिंगापुर और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

बढ़ती जनसंख्या और मैंग्रोव का नुकसान

मोंटक्लेयर स्टेट यूनिवर्सिटी की जीवविज्ञानी प्रोफेसर जेनिफर क्रुमिन्स द्वारा किए गए इस अध्ययन को एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। शोध में पाया गया कि जब किसी क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व 300 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर तक पहुंच जाता है, तो वहां के मैंग्रोव जंगलों की मिट्टी में जमा कार्बन स्टॉक 37% तक कम हो जाता है।

कार्बन उत्सर्जन की चिंताजनक वृद्धि

वर्तमान में मैंग्रोव वनों के विनाश से कार्बन उत्सर्जन की वार्षिक दर लगभग 7.0 टेराग्राम आंकी गई है। शोध में चेतावनी दी गई है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो सदी के अंत तक यह उत्सर्जन 3,392 टेराग्राम तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि 50,000% से अधिक होगी, जो वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

जलवायु स्थिरता में मैंग्रोव का योगदान

मैंग्रोव वन पृथ्वी की सतह का मात्र 0.1% हिस्सा कवर करते हैं, लेकिन जलवायु संतुलन बनाए रखने में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। मैंग्रोव की मिट्टी में मौजूद कार्बन भंडारण की क्षमता अन्य जंगलों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक होती है। इसलिए, इनका विनाश सीधे तौर पर ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को बढ़ाने में योगदान दे सकता है।

मैंग्रोव संरक्षण की आवश्यकता

प्रोफेसर क्रुमिन्स का कहना है कि, “हमें यह समझने की जरूरत है कि मैंग्रोव वन पर मानव गतिविधियों और बढ़ती जनसंख्या का क्या प्रभाव पड़ रहा है। यदि हम इन वनों की रक्षा नहीं करेंगे, तो कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि होगी, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।”

शोध स्पष्ट रूप से दिखाता है कि मैंग्रोव वनों का निरंतर विनाश हमारे पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है। यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो सदी के अंत तक कार्बन उत्सर्जन में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। इसलिए, वैश्विक स्तर पर मैंग्रोव वनों के संरक्षण के लिए ठोस नीतियों और योजनाओं की आवश्यकता है।

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