भारत में जलवायु परिवर्तन का गहराता असर कृषि क्षेत्र पर साफ़ दिखने लगा है। बेमौसम बारिश, भीषण गर्मी और बाढ़ की घटनाओं ने फसल उत्पादन को प्रभावित किया है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए देश के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ आधुनिक नवाचार अपना रहे हैं, जो जलवायु अनुकूल खेती की दिशा में बड़े कदम हैं।
कृषि में नवाचार क्यों ज़रूरी है?
जलवायु परिवर्तन की वजह से पारंपरिक कृषि मॉडल अप्रभावी होते जा रहे हैं। समय से पहले बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं फसलों को बर्बाद कर रही हैं। किसानों को अब ऐसे समाधान अपनाने की ज़रूरत है, जो जलवायु की अनिश्चितताओं से निपटने में मदद करें। भारत सरकार ने 2024-25 के बजट में 1.52 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया है, जिसमें जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ज़ोर दिया गया है।
राजस्थान: बांसवाड़ा के आदिवासियों का समाधान
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में आदिवासी किसानों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ नवाचार को अपनाया है। अमलीपाड़ा गांव के एक स्वयं सहायता समूह ने सूखे और अनियमित बारिश की चुनौतियों के बावजूद खेती के नए तरीके अपनाए हैं। उनके मॉडल में कम पानी वाली फसलें उगाई जा रही हैं, जिससे संसाधनों की बचत के साथ-साथ उत्पादन भी बढ़ रहा है।
ओडिशा: ‘पारा खेती’ का जलवायु अनुकूल मॉडल
ओडिशा में किसानों ने पराली का बेहतर उपयोग करने के लिए ‘पारा खेती’ को अपनाया है। धान की कटाई के बाद बची पराली को खेत में मल्च की तरह फैलाकर दलहन और तिलहन की बुआई की जाती है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और रासायनिक उर्वरकों की ज़रूरत भी घटती है। इस पद्धति ने पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को भी कम किया है।
आंध्र प्रदेश: सूखी बुवाई का नवाचार
आंध्र प्रदेश के किसान मानसून से पहले सूखी बुवाई (dry seeding) का तरीका अपना रहे हैं। इस पद्धति में बुआई के लिए बारिश का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि मिट्टी की बची हुई नमी का उपयोग किया जाता है। इससे फसलें जल्दी पकती हैं और उत्पादन बढ़ता है। सूखी बुवाई ने किसानों की सिंचाई पर निर्भरता भी कम की है, जिससे इनपुट लागत घटने के साथ फसल का लचीलापन भी बढ़ा है।
बिहार: वर्मीकंपोस्टिंग से टिकाऊ विकास की ओर
बिहार के मधुबनी जिले में वर्मीकंपोस्टिंग के साथ नई कृषि पहल की जा रही है। किसानों को गोबर और फसल अवशेष देकर वर्मीकंपोस्ट उत्पादन के बदले मुफ्त एलपीजी सिलेंडर रिफिल मिलते हैं। इस मॉडल से न केवल कार्बन उत्सर्जन घट रहा है, बल्कि मछलीपालन के लिए भी वर्मीकंपोस्ट की मांग बढ़ी है, जिससे किसानों की आय में इजाफा हो रहा है।
जलवायु अनुकूल खेती: नीति और नवाचार का संगम
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कृषि में नवाचारों का व्यापक स्तर पर अपनाया जाना ज़रूरी है। इन प्रथाओं ने दिखाया है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के साथ-साथ आजीविका भी सुरक्षित कर सकता है। सरकार को इन सफल पद्धतियों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए वित्तीय सहायता और नीतिगत समर्थन देना चाहिए।
राजस्थान, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और बिहार के ये उदाहरण बताते हैं कि जलवायु अनुकूल कृषि कैसे किसानों को न केवल पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रही है, बल्कि उनके आर्थिक विकास का रास्ता भी खोल रही है। इन प्रयासों को व्यापक समर्थन देकर भारत एक टिकाऊ और समृद्ध कृषि व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।