हर साल जमा हो रहा है 40 करोड़ टन कार्बन: पर्यावरण के लिए बढ़ता खतरा

saurabh pandey
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आजकल हम मानव निर्मित उत्पादों के बारे में ज्यादा नहीं सोचते, लेकिन इन उत्पादों में हर साल लाखों टन कार्बन जमा हो रहा है। वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन से यह पता चला है कि पिछले 25 वर्षों में प्लास्टिक, रबर और इमारतों जैसे उत्पादों में करीब 840 करोड़ टन कार्बन जमा हो चुका है, और यह आंकड़ा हर साल लगभग 40 करोड़ टन बढ़ रहा है। यह कार्बन एक प्रकार से इन उत्पादों में जमा होता है, लेकिन इस जमा कार्बन का सही तरीके से निपटान न होने पर यह पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

कार्बन के जमा होने का बढ़ता खतरा

नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में यह जानकारी दी है कि प्लास्टिक, इमारतों और बुनियादी ढांचे जैसी चीजों में हर साल करीब 40 करोड़ टन जीवाश्म कार्बन जुड़ रहा है। यह उत्पाद हालांकि एक प्रकार से कार्बन सिंक की तरह काम कर रहे हैं, लेकिन यदि इन्हें उचित तरीके से निपटाया नहीं गया तो यह पर्यावरण और जलवायु के लिए बेहद खतरनाक हो सकते हैं। कार्बन के इन उत्पादों में जमा होने से जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति और भी अधिक गंभीर हो सकती है।

विकसित हो रहे कार्बन टाइम बम्ब

प्लास्टिक और रबर के उत्पादों में जमा होने वाला यह कार्बन एक ‘टाइम बम्ब’ की तरह काम कर सकता है, जो भविष्य में पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इस दौरान लगभग 370 करोड़ टन कार्बन लैंडफिल, जलाने और अन्य कचरे के रूप में वापस पर्यावरण में पहुंच चुका है। यदि इनका उचित निपटान न किया गया, तो यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी वृद्धि कर सकता है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज कर देगा।

क्या हैं इसके प्रभाव?

यहां तक कि ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन के उपयोग में भी वृद्धि हो रही है, जो कार्बन प्रदूषण का मुख्य कारण बन रहा है। 2024 तक जीवाश्म ईंधन और सीमेंट से होने वाला कार्बन प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। हालांकि, इन शोधों में यह भी बताया गया है कि प्लास्टिक और रबर जैसे उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, और इनसे जो कार्बन उत्पादों में जमा हो रहा है, उसे अनदेखा किया जा रहा है।

निपटान और रीसाइक्लिंग की आवश्यकता

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन उत्पादों के जीवनकाल को बढ़ाना और रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया को बढ़ावा देना जरूरी है। इससे न केवल कार्बन के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है, बल्कि कचरे के रूप में नष्ट होने वाले कार्बन को भी नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, लैंडफिल से निकलने वाले कचरे को सीमित करने के लिए सख्त नीतियों की आवश्यकता है।

अंततः यह शोध इस तथ्य को उजागर करता है कि अब हमें न केवल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, बल्कि उन उत्पादों के जीवनकाल, उनकी रीसाइक्लिंग और उचित निपटान पर भी ध्यान देना आवश्यक है जिनमें कार्बन जमा हो रहा है। अन्यथा, यह ‘कार्बन टाइम बम्ब’ भविष्य में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट को और भी अधिक गंभीर बना सकता है।

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